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शरीर मे वात ,पित्त, कफ प्रकुपित होने पर अलग अलग तरह के वात रोग होते हे l
1) धातू क्षयजन्य वात रोग
2 ) अवरोधजन्य वात रोग
धातू क्षयजन्य वातरोग….
शरीर मे स्थित सप्तधातू ( रस,रक्त ,मांस मेद, अस्थी, मज्जा, शुक्र) अगर क्षीण होते हैं या उन मे क्षय निर्माण होने से शरीर मे वात दोष बढ जाता है उसके स्वरूप अनुसार विविध प्रकार के धातूक्षय जन्य वात रोग होते है l जिस धातू का क्षय हुआ है उसके स्वरूप अनुसार चिकित्सा करने से धातू क्षय जन्य वात रोग नष्ट होते हैं l
2 ) अवरोधजन्य वातरोग –
शरीर मे प्रकृपित पित्त या कफ वात दोष के गति को अवरोध निर्माण करते है उस अवरोध अनुसार शरीर मे स्थित वात दोष बिगड जाता है l उसके स्वरूप अवरोधजन्य वातरोग तयार होते है l
शरीर मे प्रकुपित पित्त और कफको साम्य अवस्था मे लाकर अवरोध नष्ट किया जाता हे, lउसके स्वरूप अवरोधजन्य वात रोग ठीक हो जाते हैं l
शरीर मे वातरोग बढने का कारण आहार विहार ठीक न करना इसका मतलब गलत खान पान की वजह से शरीर मे अशुद्ध और अपक्व आहार रस की निर्मिती हो जाती है lउससे शरीर स्थित धातू का पोषण न होना और प्रकुपित दोषसे शरीर स्त्रोतोसो मे अवरोध निर्माण होना इन बातो से शरीर मे वात रोग की निर्मिती हो जाती है l
आयुर्वेद इन सभी कारनो को पहचान कर उन पर उपचार करता है l
आयुर्वेद में शरीर शुध्दीकरण का महत्व बहुत उच्च माना जाता है। इसे रोगों के इलाज के लिए, रोगों की रोकथाम में और स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर शुद्धीकरण के माध्यम से शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर संतुलित और स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है। यह संतुलित आहार, व्यायाम, और विभिन्न प्रकार की शोधन प्रक्रियाओं द्वारा किया जा सकता है।शरीर शुध्दीकरण का समय व्यक्ति के रोग और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति के शारीरिक प्रकृति, रोग की गंभीरता, रोग की अवधि, चिकित्सा योजना, और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित होता है। कुछ प्रकार के पंचकर्म प्रक्रियाएं एक से अधिक दिनों तक चल सकती हैं, जबकि कुछ केवल कुछ दिनों तक हो सकती हैं। इसलिए, शरीर शुध्दीकरण की अवधि व्यक्ति के विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
आज कल की भाग दौडकी जिंदगी मे पंचकर्म के लिये अस्पताल मे जाकर शरीर शुद्धीकरण करना इच्छा होने के बावजूद मुश्किल हो रहा है l
शरीर शुद्धीकरण के लिये Admit होकर उपचार करना, पंचकर्म करना बहुत सारे रोंगो को मुश्किल है l
इसलिये “च्यवन आयुर्वेद ” ने एक नई संकल्पना तयार की है ,जो आपको घर मे ही रहकर आपको अस्पताल जैसी सुविधा देकर “संपूर्ण शुद्धीकरण “प्रक्रिया करता है l
इसके लिये अस्पताल मे जाकर वहा Admit होकर पंचकर्म चिकित्सा करने की जरूरत नही है l “च्यवन आयुर्वेद” के डॉक्टर आपके घर आकर आपके संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण प्रक्रिया के लिए प्लॅन तयार करेंगे lउसके लिये आवश्यक औषधी ,काढा,तेल, मसाज तेल,बस्ती की औषधीया सभी आपको घर मे ही दी जायेंगी
सभी दवाईया, काढे,बस्ती,आपको दिये हुये वक्त पर लेना है l
पंचकर्म मे स्नेहन,स्वेदन के लिये “च्यवन आयुर्वेद “का थेरपीस्ट एक समय पर आपके घर आकर स्नेहन,स्वेदन और बस्ती चिकित्सा करेगा l
हर व्यक्ती का पंचकर्म अलग अलग रहता है l हमारे डॉक्टर इस पंचकर्म और उसके कालावधी को आपके वय, प्रकृती परीक्षण अनुसार तय करेंगे l
घर मे रहकर आपका संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण प्रक्रिया अस्पताल जैसे हो जायेगा l इसके लिये आपको कही जाना नही है , Admit होना नही है l
वात रोग मे सर्वाधिक होने वाला संधिगतवात हैं l
वृद्धावस्था मे यह जादा तर दिखाई देता है |
आमवात, वातरक्त जैसे वात रोग अगर ज्यादा दिन तक शरीर मे रहे तो बाद में उनके साथ संधिगतवात भी हो जाता है l
शरीर के सप्तधातू मे क्षय होने के बाद संधिगत वात की निर्मिती होती है l ज्यादा दिंन तक संधीगत वात शरीर मे रहने से शरीर के जोडाे मे दर्द बढने से उनका नाश होता हैंl उन जोडो की क्रिया हानी हो जाती हैl
ज्यादा तर वृद्धावस्था मे दिखाई देने वाला यह व्याधी आमवात, वातरक्त व्याधी के कारण युवा मे भी जादा दिखाई देने लगा है l
फास्ट फूड, जंक फूड, हॉटेल के आहार का सेवन इन आदतो के कारण शरीर धातू का पोषण नहीं होता है, इस वजह से आजकल युवा मे ये रोग जादा तर दिखाई देने लगा है l
घुटनो मे, कंधो मे, कुल्हो मे, यह ज्यादातर दिखाई देता है l
लक्षण –
सभी जोडो मे तीव्र दर्द दिखाई देता है l
कभी कभी इसके साथ सुजन, त्वचा लाल होना यह लक्षण दिखाई देते है l
शरीर के हालचाल के दरम्यान यह बढ जाता है l
घुटनो मे तीव्र दर्द, एडियो मे, कंधो में और कभी कभी कुल्हो मे जादा तर दिखाई देता है l
स्थिधातू का पोषण कम होने के कारण अस्थी धातू की झीज हो जाती है l
इस वजह से इसकी निर्मिती हो जाती है l
आमवात और Rheumatoid Arthritis इन दो रोगोके लक्षण समान होते है l आमवात एक बहुत दर्दनाक वात रोग है l
गलत खान पान और आहार विहार के कारण शरीर मे पाचन क्षमता मे बिघाड हो जाता है l
अपक्व आहार रस की निर्मिती होती है l उससे बाद मे “आम ” निर्माण होता है l यह आम वात दोष के गती को अवरोध निर्माण करता है l बाद में वात दोष भी प्रकुपीत होता है, इस तरह आमवात की निर्मिती होती है l
शरीर मे सभी जोडो मे सूजन एवं तेज दर्द निर्माण होता है l Modern Science के अनुसार इसे Auto Immune Disease कहा जाता है, असाध्य समझा जाता है l लेकीन आयुर्वेद के अनुसार इसे साध्य एवम कष्ट साध्य समझा जाता है l
सही समय पर आयुर्वेद उपचार करने पर यह पूरा ठीक होता है l आमवात सभी उम्र के लोगो को होता है l इसे ज्यादा तर शरीर के बडे संधीयो मे देखा जाता है l पुराना होने पर सभी संधीयो मे फैल जाता है l बाद मे उस संधियो मे अखडन निर्माण करता है l
लक्षण:-
संपूर्ण शरीर एवं जोडो मे बहुत दर्द, सुजन और बुखार निर्माण होता है l घुटनो मे एडियो मे, कंधो मे, कलाई मे, दर्द, सूजन निर्माण करता है l
जोडो मे सूजन, गरम स्पर्श, त्वचा लाल होना, तेज दर्द, अखडन निर्माण होती है l
पुराना होने पर शरीर के सभी संधीयोमे फैल जाता है l इस सभी लक्षण के साथ अरुची, अपचन, आलस्य, आम्लपित्त, मलावष्टंभ हे लक्षण निर्माण होते है l
रिढ के हड्डी, मेरुदंड के रोग किसी भी आयु मे होते है l शारीरिक पोषण न होने के कारण मांसधातू, अस्थी धातू पोषण कम हो जाता है l
व्यायाम के अभाव से शरीर के स्नायू कमजोर हो जाते है lस्नायू कठीण बन जाते है l इससे मेरुदंड पर जादा दबाव पडने से डिस्क पर दबाव आता है, उससे मज्जारज्जू से निकलने वाले मज्जातंतू पर जादा दबाव बढ जाता हैl
ये सभी मज्जा तंतू गर्दन,कंधे से कमर के रिढ की हड्डी से हाथ और पैरो मे जाते है l इससे दोनो तरफ के स्नायू को बल मिलता है l
पोषण कम होने से डिस्क खराब,कमकुवत होती है lउससे भी शरीर मे दर्द होता है lजादा तर युवाओ मे होने वाले इस रोग मे गलत खानपान ,व्यायाम का अभाव और कम पोषण मूल्य का आहार समाविष्ट है l
वयस्को में उनके वय के हिसाब से धातू पोषण कम हो जाता है उससे यह रोग दिखाई देते है l कई बार अपने शारीरिक क्षमता से ज्यादा वजन उठाना ,काम करना और कही बार एक्सीडेंट से ये रोग होते है l
Cervical spondylosis :-
कंधे मे दर्द
गर्दन अखडना
एक या दोनो हाथ मे दर्द होना, हाथ सुन्न होना
उंगलीयो मे दर्द होना
सिर दर्द होना
पीठ मे दर्द होना
Lumber spondylosis :-
कमर में दर्द
कमर अखडना
आगे पीछे झुकते समय दर्द होना
कूल्हो में (Hip Joint) में दर्द होना
एक या दोनो पैरो में दर्द होना
एक या दोनो पैर सुन्न होना
वांतरोगो मे युवको मे जादा तर होने वाला ये रोग है l आमवात और Ankylosing Spondylosis के लक्षण ज्यादातर समान रहते है l
शरीर के spine ( मेरुदंड) में तेजदर्द करनेवाला रोग है l गलत खान पान की वजह से शरीर के पाचन तंत्र मे बिघाड हो जाता है l
अपक्व आहार रस निर्माण होने के बाद में आगे उससे आम बनता है l यही आम अगर मेरुदंड में जाये तो वहा यह रोग तयार हो जाता है l
यह भी एक Auto Immune Disease है जिसे modern science में असाध्य समझा जाता हैl लेकीन सही समय पर शुद्ध आयुर्वेद करने के बाद यह रोग आयुर्वेद के दृष्टी से साध्य है l
प्रथम अवस्था मे रीढ की हड्डी मे और बाद मे पुरे मेरूदंड मे फैल जाता हैlपुराना होने पर सभी मेरुदंड एक – एक करके चिपक जाते है l इससे आदमी बिलकुल हील नही सकता lबांबू की तरह हो जाता है, इसलिये इसे बांबू स्पाइन कहा जाता है l
लक्षण:-
इस रोग की शूरू में रिढ की हड्डी मे दर्द होता है l बाद में यह बहुत बढ जाता है, जिसकी वजह से शरीर हिलाना मुश्किल हो जाता है l
बाद में यह दर्द पूरे मेरुदंड(spine) मे फैलता हैl इस वजह से उठना – बैठना, सोना इस तरह के कोई भी काम करना मुश्किल होता है l
शरीर हमेशा बुखार होने की तरह गरम रहता है l रोग जैसे जैसे पुराना होता है तो पुरे मेरूदंड मे अखडण पैदा होती है l जिसकी वजह से आगे पीछे झुकना, गर्दन हिलाना, सीधे सोना सभी बंद हो जाता है lआदमी बांबू की तरह सरल हो जाता है l
कुल्हो की संधी मे दर्द ,मन्यास्तंभ (गर्दन अखडना) घुटनो मे दर्द ऐसे लक्षण आमवात जैसे तयार होते है l
इसके साथ – साथ पाचन तंत्र के आम्लपित्त, अरुची जैसे लक्षण तो हमेशा होते हैl
शरीर मे वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने पर इस व्याधी की निर्मिती होती है l शरीर के छोटे छोटे जोडो मे ये दिखाई देता है l
शरीर के हाथ और पैरो के उंगली के संधियो मे जादा तर दिखाई देता हैl संधी प्रदेश मे तीव्र पीडा होती है l
लवण, आम्ल, कटू, अतिस्निग्ध, क्षार, अतिउष्ण पदार्थ सेवन करना, मिथ्या आहार विहार, विरुद्धआहार सेवन अति मांसाहार इस कारनों से वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने के बाद वातरक्त का निर्माण होता है l
ज्यादा तर अंगुष्ठमूलसे इसकी शुरुवात होती है l Modern Science मे Gout disease इसका लक्षण साधर्म्या रोग समझा जाता है l
सही समय और योग्य आयुर्वेद उपचार से वातरक्त पुरी तरह से ठीक होता है l
लक्षण:-
संधीप्रदेश में तीव्र वेदना, संधिप्रदेश आरक्त वर्ण हो जाता है l
जोडो मे शोथ ( सुजन) रहती है l स्पर्श गरम रहने से तीव्र वेदना के कारण हलका आघात भी नही सहन होता l
ये रोग पुराना होने के बाद शरीर के सभी जोडो में फेल जाता है l शरीर को पुरी तरह पंगु बनाता है l
रोग पुराना होने के बाद छोटे – छोटे जोडो मेंअखडन पैदा करता है l
नाम से ही इस आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा का उद्देश आपके समझ मे आता है l रुग्ण के प्रकृती का परीक्षण करने के बाद संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा का प्लॅन तयार किया जाता है l इस चिकित्सा से शरीर का अंतर्गत शरीर शुद्धीकरण किया जाता है l
हमारी इस हर रोज की भागदौड की जिंदगी मे हम अपने आपको पूरी तरह फिट रखना चाहते है l आरोग्य ठीक रखने के लिए प्राणायाम योगासन व्यायाम या जिम जाते है l बहुत दिन तक ये सब कुछ करने से भी हमे आरोग्य नही मिलता l बहुत बार बडा हुआ वजन कम करने के लिए ही व्यायाम करते है l
वात रोग मे सर्वाधिक होने वाला संधिगतवात हैं l
वृद्धावस्था मे यह जादा तर दिखाई देता है |
आमवात, वातरक्त जैसे वात रोग अगर ज्यादा दिन तक शरीर मे रहे तो बाद में उनके साथ संधिगतवात भी हो जाता है l
शरीर के सप्तधातू मे क्षय होने के बाद संधिगत वात की निर्मिती होती है l ज्यादा दिंन तक संधीगत वात शरीर मे रहने से शरीर के जोडाे मे दर्द बढने से उनका नाश होता हैंl उन जोडो की क्रिया हानी हो जाती हैl
ज्यादा तर वृद्धावस्था मे दिखाई देने वाला यह व्याधी आमवात, वातरक्त व्याधी के कारण युवा मे भी जादा दिखाई देने लगा है l
फास्ट फूड, जंक फूड, हॉटेल के आहार का सेवन इन आदतो के कारण शरीर धातू का पोषण नहीं होता है, इस वजह से आजकल युवा मे ये रोग जादा तर दिखाई देने लगा है l
घुटनो मे, कंधो मे, कुल्हो मे, यह ज्यादातर दिखाई देता है l
लक्षण –
सभी जोडो मे तीव्र दर्द दिखाई देता है l
कभी कभी इसके साथ सुजन, त्वचा लाल होना यह लक्षण दिखाई देते है l
शरीर के हालचाल के दरम्यान यह बढ जाता है l
घुटनो मे तीव्र दर्द, एडियो मे, कंधो में और कभी कभी कुल्हो मे जादा तर दिखाई देता है l
स्थिधातू का पोषण कम होने के कारण अस्थी धातू की झीज हो जाती है l
इस वजह से इसकी निर्मिती हो जाती है l
आमवात और Rheumatoid Arthritis इन दो रोगोके लक्षण समान होते है l आमवात एक बहुत दर्दनाक वात रोग है l
गलत खान पान और आहार विहार के कारण शरीर मे पाचन क्षमता मे बिघाड हो जाता है l
अपक्व आहार रस की निर्मिती होती है l उससे बाद मे “आम ” निर्माण होता है l यह आम वात दोष के गती को अवरोध निर्माण करता है l बाद में वात दोष भी प्रकुपीत होता है, इस तरह आमवात की निर्मिती होती है l
शरीर मे सभी जोडो मे सूजन एवं तेज दर्द निर्माण होता है l Modern Science के अनुसार इसे Auto Immune Disease कहा जाता है, असाध्य समझा जाता है l लेकीन आयुर्वेद के अनुसार इसे साध्य एवम कष्ट साध्य समझा जाता है l
सही समय पर आयुर्वेद उपचार करने पर यह पूरा ठीक होता है l आमवात सभी उम्र के लोगो को होता है l इसे ज्यादा तर शरीर के बडे संधीयो मे देखा जाता है l पुराना होने पर सभी संधीयो मे फैल जाता है l बाद मे उस संधियो मे अखडन निर्माण करता है l
लक्षण:-
संपूर्ण शरीर एवं जोडो मे बहुत दर्द, सुजन और बुखार निर्माण होता है l घुटनो मे एडियो मे, कंधो मे, कलाई मे, दर्द, सूजन निर्माण करता है l
जोडो मे सूजन, गरम स्पर्श, त्वचा लाल होना, तेज दर्द, अखडन निर्माण होती है l
पुराना होने पर शरीर के सभी संधीयोमे फैल जाता है l इस सभी लक्षण के साथ अरुची, अपचन, आलस्य, आम्लपित्त, मलावष्टंभ हे लक्षण निर्माण होते है l
रिढ के हड्डी, मेरुदंड के रोग किसी भी आयु मे होते है l शारीरिक पोषण न होने के कारण मांसधातू, अस्थी धातू पोषण कम हो जाता है l
व्यायाम के अभाव से शरीर के स्नायू कमजोर हो जाते है lस्नायू कठीण बन जाते है l इससे मेरुदंड पर जादा दबाव पडने से डिस्क पर दबाव आता है, उससे मज्जारज्जू से निकलने वाले मज्जातंतू पर जादा दबाव बढ जाता हैl
ये सभी मज्जा तंतू गर्दन,कंधे से कमर के रिढ की हड्डी से हाथ और पैरो मे जाते है l इससे दोनो तरफ के स्नायू को बल मिलता है l
पोषण कम होने से डिस्क खराब,कमकुवत होती है lउससे भी शरीर मे दर्द होता है lजादा तर युवाओ मे होने वाले इस रोग मे गलत खानपान ,व्यायाम का अभाव और कम पोषण मूल्य का आहार समाविष्ट है l
वयस्को में उनके वय के हिसाब से धातू पोषण कम हो जाता है उससे यह रोग दिखाई देते है l कई बार अपने शारीरिक क्षमता से ज्यादा वजन उठाना ,काम करना और कही बार एक्सीडेंट से ये रोग होते है l
Cervical spondylosis :-
कंधे मे दर्द
गर्दन अखडना
एक या दोनो हाथ मे दर्द होना, हाथ सुन्न होना
उंगलीयो मे दर्द होना
सिर दर्द होना
पीठ मे दर्द होना
Lumber spondylosis :-
कमर में दर्द
कमर अखडना
आगे पीछे झुकते समय दर्द होना
कूल्हो में (Hip Joint) में दर्द होना
एक या दोनो पैरो में दर्द होना
एक या दोनो पैर सुन्न होना
वांतरोगो मे युवको मे जादा तर होने वाला ये रोग है l आमवात और Ankylosing Spondylosis के लक्षण ज्यादातर समान रहते है l
शरीर के spine ( मेरुदंड) में तेजदर्द करनेवाला रोग है l गलत खान पान की वजह से शरीर के पाचन तंत्र मे बिघाड हो जाता है l
अपक्व आहार रस निर्माण होने के बाद में आगे उससे आम बनता है l यही आम अगर मेरुदंड में जाये तो वहा यह रोग तयार हो जाता है l
यह भी एक Auto Immune Disease है जिसे modern science में असाध्य समझा जाता हैl लेकीन सही समय पर शुद्ध आयुर्वेद करने के बाद यह रोग आयुर्वेद के दृष्टी से साध्य है l
प्रथम अवस्था मे रीढ की हड्डी मे और बाद मे पुरे मेरूदंड मे फैल जाता हैlपुराना होने पर सभी मेरुदंड एक – एक करके चिपक जाते है l इससे आदमी बिलकुल हील नही सकता lबांबू की तरह हो जाता है, इसलिये इसे बांबू स्पाइन कहा जाता है l
लक्षण:-
इस रोग की शूरू में रिढ की हड्डी मे दर्द होता है l बाद में यह बहुत बढ जाता है, जिसकी वजह से शरीर हिलाना मुश्किल हो जाता है l
बाद में यह दर्द पूरे मेरुदंड(spine) मे फैलता हैl इस वजह से उठना – बैठना, सोना इस तरह के कोई भी काम करना मुश्किल होता है l
शरीर हमेशा बुखार होने की तरह गरम रहता है l रोग जैसे जैसे पुराना होता है तो पुरे मेरूदंड मे अखडण पैदा होती है l जिसकी वजह से आगे पीछे झुकना, गर्दन हिलाना, सीधे सोना सभी बंद हो जाता है lआदमी बांबू की तरह सरल हो जाता है l
कुल्हो की संधी मे दर्द ,मन्यास्तंभ (गर्दन अखडना) घुटनो मे दर्द ऐसे लक्षण आमवात जैसे तयार होते है l
इसके साथ – साथ पाचन तंत्र के आम्लपित्त, अरुची जैसे लक्षण तो हमेशा होते हैl
शरीर मे वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने पर इस व्याधी की निर्मिती होती है l शरीर के छोटे छोटे जोडो मे ये दिखाई देता है l
शरीर के हाथ और पैरो के उंगली के संधियो मे जादा तर दिखाई देता हैl संधी प्रदेश मे तीव्र पीडा होती है l
लवण, आम्ल, कटू, अतिस्निग्ध, क्षार, अतिउष्ण पदार्थ सेवन करना, मिथ्या आहार विहार, विरुद्धआहार सेवन अति मांसाहार इस कारनों से वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने के बाद वातरक्त का निर्माण होता है l
ज्यादा तर अंगुष्ठमूलसे इसकी शुरुवात होती है l Modern Science मे Gout disease इसका लक्षण साधर्म्या रोग समझा जाता है l
सही समय और योग्य आयुर्वेद उपचार से वातरक्त पुरी तरह से ठीक होता है l
लक्षण:-
संधीप्रदेश में तीव्र वेदना, संधिप्रदेश आरक्त वर्ण हो जाता है l
जोडो मे शोथ ( सुजन) रहती है l स्पर्श गरम रहने से तीव्र वेदना के कारण हलका आघात भी नही सहन होता l
ये रोग पुराना होने के बाद शरीर के सभी जोडो में फेल जाता है l शरीर को पुरी तरह पंगु बनाता है l
रोग पुराना होने के बाद छोटे – छोटे जोडो मेंअखडन पैदा करता है l
नाम से ही इस आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा का उद्देश आपके समझ मे आता है l रुग्ण के प्रकृती का परीक्षण करने के बाद संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा का प्लॅन तयार किया जाता है l इस चिकित्सा से शरीर का अंतर्गत शरीर शुद्धीकरण किया जाता है l
हमारी इस हर रोज की भागदौड की जिंदगी मे हम अपने आपको पूरी तरह फिट रखना चाहते है l आरोग्य ठीक रखने के लिए प्राणायाम योगासन व्यायाम या जिम जाते है l बहुत दिन तक ये सब कुछ करने से भी हमे आरोग्य नही मिलता l बहुत बार बडा हुआ वजन कम करने के लिए ही व्यायाम करते है l
वात रोगों से मुक्ति के लिये आयुर्वेद ही क्यो?
आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार किसी भी रोगों पर उपचार उसकी जड पर होता है l रोगो के लक्षणो के अनुसार या रोगो के लक्षणो पर आयुर्वेद उपचार नहीं करता l
शरीर मे स्थित वात, पित्त, कफ इन तीन दोषो मे जब असंतुलन पैदा होता है, स तब शरीर मे रोगो की निर्मिती हो जाती है l कभी कभी वात दोष किसी कारणा नुसार खुद बिगड जाता है और कभी शरीर मे प्रकूपित्त पित्त और कफ दोष वात को बिगाड देते है l इन सभी कारणो से शरीर मे बात रोग हो जाते है l
शरीर मे वात ,पित्त, कफ प्रकुपित होने पर अलग अलग तरह के वात रोग होते हे l
1) धातू क्षयजन्य वात रोग
2 ) अवरोधजन्य वात रोग
धातू क्षयजन्य वातरोग….
शरीर मे स्थित सप्तधातू ( रस,रक्त ,मांस मेद, अस्थी, मज्जा, शुक्र) अगर क्षीण होते हैं या उन मे क्षय निर्माण होने से शरीर मे वात दोष बढ जाता है उसके स्वरूप अनुसार विविध प्रकार के धातूक्षय जन्य वात रोग होते है l जिस धातू का क्षय हुआ है उसके स्वरूप अनुसार चिकित्सा करने से धातू क्षय जन्य वात रोग नष्ट होते हैं l
2 ) अवरोधजन्य वातरोग –
शरीर मे प्रकृपित पित्त या कफ वात दोष के गति को अवरोध निर्माण करते है उस अवरोध अनुसार शरीर मे स्थित वात दोष बिगड जाता है l उसके स्वरूप अवरोधजन्य वातरोग तयार होते है l
शरीर मे प्रकुपित पित्त और कफको साम्य अवस्था मे लाकर अवरोध नष्ट किया जाता हे, lउसके स्वरूप अवरोधजन्य वात रोग ठीक हो जाते हैं l
शरीर मे वातरोग बढने का कारण आहार विहार ठीक न करना इसका मतलब गलत खान पान की वजह से शरीर मे अशुद्ध और अपक्व आहार रस की निर्मिती हो जाती है lउससे शरीर स्थित धातू का पोषण न होना और प्रकुपित दोषसे शरीर स्त्रोतोसो मे अवरोध निर्माण होना इन बातो से शरीर मे वात रोग की निर्मिती हो जाती है l
आयुर्वेद इन सभी कारनो को पहचान कर उन पर उपचार करता है l
पंचकर्म चिकित्सा एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें पाँच विभिन्न प्रकार के शोधन या शुद्धिकरण के प्रक्रियाएं होती हैं। इन प्रक्रियाओं का उपयोग रोगों के इलाज और स्वास्थ्य सुधार के लिए किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति शिरा संशोधन, वमन, विरेचन, नस्य, बस्ती और रक्तमोक्षण से मिलकर बनी होती है।पंचकर्म को आम तौर पर शरीर की शुद्धि और संतुलन को बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह रोगों का इलाज, शारीरिक संतुलन को बनाए रखने और स्वस्थ जीवनशैली के लिए भी किया जा सकता है।
आयुर्वेद में शरीर शुध्दीकरण का महत्व बहुत उच्च माना जाता है। इसे रोगों के इलाज के लिए, रोगों की रोकथाम में और स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर शुद्धीकरण के माध्यम से शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर संतुलित और स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है। यह संतुलित आहार, व्यायाम, और विभिन्न प्रकार की शोधन प्रक्रियाओं द्वारा किया जा सकता है।शरीर शुध्दीकरण का समय व्यक्ति के रोग और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति के शारीरिक प्रकृति, रोग की गंभीरता, रोग की अवधि, चिकित्सा योजना, और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित होता है। कुछ प्रकार के पंचकर्म प्रक्रियाएं एक से अधिक दिनों तक चल सकती हैं, जबकि कुछ केवल कुछ दिनों तक हो सकती हैं। इसलिए, शरीर शुध्दीकरण की अवधि व्यक्ति के विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
वात रोगों से मुक्ति के लिये आयुर्वेद ही क्यो?
आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार किसी भी रोगों पर उपचार उसकी जड पर होता है l रोगो के लक्षणो के अनुसार या रोगो के लक्षणो पर आयुर्वेद उपचार नहीं करता l
शरीर मे स्थित वात, पित्त, कफ इन तीन दोषो मे जब असंतुलन पैदा होता है, स तब शरीर मे रोगो की निर्मिती हो जाती है l कभी कभी वात दोष किसी कारणा नुसार खुद बिगड जाता है और कभी शरीर मे प्रकूपित्त पित्त और कफ दोष वात को बिगाड देते है l इन सभी कारणो से शरीर मे बात रोग हो जाते है l
शरीर मे वात ,पित्त, कफ प्रकुपित होने पर अलग अलग तरह के वात रोग होते हे l
1) धातू क्षयजन्य वात रोग
2 ) अवरोधजन्य वात रोग
धातू क्षयजन्य वातरोग….
शरीर मे स्थित सप्तधातू ( रस,रक्त ,मांस मेद, अस्थी, मज्जा, शुक्र) अगर क्षीण होते हैं या उन मे क्षय निर्माण होने से शरीर मे वात दोष बढ जाता है उसके स्वरूप अनुसार विविध प्रकार के धातूक्षय जन्य वात रोग होते है l जिस धातू का क्षय हुआ है उसके स्वरूप अनुसार चिकित्सा करने से धातू क्षय जन्य वात रोग नष्ट होते हैं l
2 ) अवरोधजन्य वातरोग –
शरीर मे प्रकृपित पित्त या कफ वात दोष के गति को अवरोध निर्माण करते है उस अवरोध अनुसार शरीर मे स्थित वात दोष बिगड जाता है l उसके स्वरूप अवरोधजन्य वातरोग तयार होते है l
शरीर मे प्रकुपित पित्त और कफको साम्य अवस्था मे लाकर अवरोध नष्ट किया जाता हे, lउसके स्वरूप अवरोधजन्य वात रोग ठीक हो जाते हैं l
शरीर मे वातरोग बढने का कारण आहार विहार ठीक न करना इसका मतलब गलत खान पान की वजह से शरीर मे अशुद्ध और अपक्व आहार रस की निर्मिती हो जाती है lउससे शरीर स्थित धातू का पोषण न होना और प्रकुपित दोषसे शरीर स्त्रोतोसो मे अवरोध निर्माण होना इन बातो से शरीर मे वात रोग की निर्मिती हो जाती है l
आयुर्वेद इन सभी कारनो को पहचान कर उन पर उपचार करता है l
पंचकर्म चिकित्सा एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें पाँच विभिन्न प्रकार के शोधन या शुद्धिकरण के प्रक्रियाएं होती हैं। इन प्रक्रियाओं का उपयोग रोगों के इलाज और स्वास्थ्य सुधार के लिए किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति शिरा संशोधन, वमन, विरेचन, नस्य, बस्ती और रक्तमोक्षण से मिलकर बनी होती है।पंचकर्म को आम तौर पर शरीर की शुद्धि और संतुलन को बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह रोगों का इलाज, शारीरिक संतुलन को बनाए रखने और स्वस्थ जीवनशैली के लिए भी किया जा सकता है।
आयुर्वेद में शरीर शुध्दीकरण का महत्व बहुत उच्च माना जाता है। इसे रोगों के इलाज के लिए, रोगों की रोकथाम में और स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर शुद्धीकरण के माध्यम से शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर संतुलित और स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है। यह संतुलित आहार, व्यायाम, और विभिन्न प्रकार की शोधन प्रक्रियाओं द्वारा किया जा सकता है।शरीर शुध्दीकरण का समय व्यक्ति के रोग और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति के शारीरिक प्रकृति, रोग की गंभीरता, रोग की अवधि, चिकित्सा योजना, और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित होता है। कुछ प्रकार के पंचकर्म प्रक्रियाएं एक से अधिक दिनों तक चल सकती हैं, जबकि कुछ केवल कुछ दिनों तक हो सकती हैं। इसलिए, शरीर शुध्दीकरण की अवधि व्यक्ति के विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है।