Chywan Ayurved

वात रोगों से मुक्ती आयुर्वेद के साथ
वात रोगों से मुक्ति के लिये आयुर्वेद ही क्यो? आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार किसी भी रोगों पर उपचार उसकी जड पर होता है l रोगो के लक्षणो के अनुसार या रोगो के लक्षणो पर आयुर्वेद उपचार नहीं करता l शरीर मे स्थित वात, पित्त, कफ इन तीन दोषो मे जब असंतुलन पैदा होता है, स तब शरीर मे रोगो की निर्मिती हो जाती है l कभी कभी वात दोष किसी कारणा नुसार खुद बिगड जाता है और कभी शरीर मे प्रकूपित्त पित्त और कफ दोष वात को बिगाड देते है l इन सभी कारणो से शरीर मे बात रोग हो जाते है l

शरीर मे वात ,पित्त, कफ प्रकुपित होने पर अलग अलग तरह के वात रोग होते हे l
1) धातू क्षयजन्य वात रोग
2 ) अवरोधजन्य वात रोग
धातू क्षयजन्य वातरोग….
शरीर मे स्थित सप्तधातू ( रस,रक्त ,मांस मेद, अस्थी, मज्जा, शुक्र) अगर क्षीण होते हैं या उन मे क्षय निर्माण होने से शरीर मे वात दोष बढ जाता है उसके स्वरूप अनुसार विविध प्रकार के धातूक्षय जन्य वात रोग होते है l जिस धातू का क्षय हुआ है उसके स्वरूप अनुसार चिकित्सा करने से धातू क्षय जन्य वात रोग नष्ट होते हैं l
2 ) अवरोधजन्य वातरोग –
शरीर मे प्रकृपित पित्त या कफ वात दोष के गति को अवरोध निर्माण करते है उस अवरोध अनुसार शरीर मे स्थित वात दोष बिगड जाता है l उसके स्वरूप अवरोधजन्य वातरोग तयार होते है l
शरीर मे प्रकुपित पित्त और कफको साम्य अवस्था मे लाकर अवरोध नष्ट किया जाता हे, lउसके स्वरूप अवरोधजन्य वात रोग ठीक हो जाते हैं l
शरीर मे वातरोग बढने का कारण आहार विहार ठीक न करना इसका मतलब गलत खान पान की वजह से शरीर मे अशुद्ध और अपक्व आहार रस की निर्मिती हो जाती है lउससे शरीर स्थित धातू का पोषण न होना और प्रकुपित दोषसे शरीर स्त्रोतोसो मे अवरोध निर्माण होना इन बातो से शरीर मे वात रोग की निर्मिती हो जाती है l
आयुर्वेद इन सभी कारनो को पहचान कर उन पर उपचार करता है l

आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा क्या होता है।
पंचकर्म चिकित्सा एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें पाँच विभिन्न प्रकार के शोधन या शुद्धिकरण के प्रक्रियाएं होती हैं। इन प्रक्रियाओं का उपयोग रोगों के इलाज और स्वास्थ्य सुधार के लिए किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति शिरा संशोधन, वमन, विरेचन, नस्य, बस्ती और रक्तमोक्षण से मिलकर बनी होती है।पंचकर्म को आम तौर पर शरीर की शुद्धि और संतुलन को बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह रोगों का इलाज, शारीरिक संतुलन को बनाए रखने और स्वस्थ जीवनशैली के लिए भी किया जा सकता है।

आयुर्वेद में शरीर शुध्दीकरण का महत्व बहुत उच्च माना जाता है। इसे रोगों के इलाज के लिए, रोगों की रोकथाम में और स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर शुद्धीकरण के माध्यम से शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर संतुलित और स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है। यह संतुलित आहार, व्यायाम, और विभिन्न प्रकार की शोधन प्रक्रियाओं द्वारा किया जा सकता है।शरीर शुध्दीकरण का समय व्यक्ति के रोग और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति के शारीरिक प्रकृति, रोग की गंभीरता, रोग की अवधि, चिकित्सा योजना, और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित होता है। कुछ प्रकार के पंचकर्म प्रक्रियाएं एक से अधिक दिनों तक चल सकती हैं, जबकि कुछ केवल कुछ दिनों तक हो सकती हैं। इसलिए, शरीर शुध्दीकरण की अवधि व्यक्ति के विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

Why Panchkarma At Home?
आजकल पंचकर्म का महत्व हर एक व्यक्ती जानता है l शरीर शुध्दीकरण प्रक्रिया के लिये पंचकर्म बहुत आवश्यक हैं l शरीर के रोगो को शरीर से कम समय में बाहर निकालने के लिए आयुर्वेद पंचकर्म बहुत उपयोगी हैं l उसके साथ निरोगी शरीर को हमेशा निरोगी रखने के लिये भी पंचकर्म चिकित्सा की जाती है l गलत आहार विहार से शरीर मे अगर किसी रोग के बीज तयार होकर उस रोग का निर्माण हो रहा हो तो पंचकर्म के द्वारा उसे उसी समय खत्म किया जा सकता है l शरीर मे अगर किसी भी रोग की निर्मिती हो रही हो , उस प्रक्रिया को आयुर्वेद मे संप्राप्ती कहा जाता है l उस संप्राप्ती को आयुर्वेद पंचकर्म द्वारा खत्म किया जा सकता है l उससे आगे शरीर मे वह रोग तयार ही ना हो l

आज कल की भाग दौडकी जिंदगी मे पंचकर्म के लिये अस्पताल मे जाकर शरीर शुद्धीकरण करना इच्छा होने के बावजूद मुश्किल हो रहा है l
शरीर शुद्धीकरण के लिये Admit होकर उपचार करना, पंचकर्म करना बहुत सारे रोंगो को मुश्किल है l
इसलिये “च्यवन आयुर्वेद ” ने एक नई संकल्पना तयार की है ,जो आपको घर मे ही रहकर आपको अस्पताल जैसी सुविधा देकर “संपूर्ण शुद्धीकरण “प्रक्रिया करता है l
इसके लिये अस्पताल मे जाकर वहा Admit होकर पंचकर्म चिकित्सा करने की जरूरत नही है l “च्यवन आयुर्वेद” के डॉक्टर आपके घर आकर आपके संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण प्रक्रिया के लिए प्लॅन तयार करेंगे lउसके लिये आवश्यक औषधी ,काढा,तेल, मसाज तेल,बस्ती की औषधीया सभी आपको घर मे ही दी जायेंगी
सभी दवाईया, काढे,बस्ती,आपको दिये हुये वक्त पर लेना है l
पंचकर्म मे स्नेहन,स्वेदन के लिये “च्यवन आयुर्वेद “का थेरपीस्ट एक समय पर आपके घर आकर स्नेहन,स्वेदन और बस्ती चिकित्सा करेगा l
हर व्यक्ती का पंचकर्म अलग अलग रहता है l हमारे डॉक्टर इस पंचकर्म और उसके कालावधी को आपके वय, प्रकृती परीक्षण अनुसार तय करेंगे l
घर मे रहकर आपका संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण प्रक्रिया अस्पताल जैसे हो जायेगा l इसके लिये आपको कही जाना नही है , Admit होना नही है l

Our Treatments
संधिगत वात/ Osteo - Arthritis

वात रोग मे सर्वाधिक होने वाला संधिगतवात हैं l
वृद्धावस्था मे यह जादा तर दिखाई देता है |

आमवात, वातरक्त जैसे वात रोग अगर ज्यादा दिन तक शरीर मे रहे तो बाद में उनके साथ संधिगतवात भी हो जाता है l

शरीर के सप्तधातू मे क्षय होने के बाद संधिगत वात की निर्मिती होती है l ज्यादा दिंन तक संधीगत वात शरीर मे रहने से शरीर के जोडाे मे दर्द बढने से उनका नाश होता हैंl उन जोडो की क्रिया हानी हो जाती हैl

ज्यादा तर वृद्धावस्था मे दिखाई देने वाला यह व्याधी आमवात, वातरक्त व्याधी के कारण युवा मे भी जादा दिखाई देने लगा है l

फास्ट फूड, जंक फूड, हॉटेल के आहार का सेवन इन आदतो के कारण शरीर धातू का पोषण नहीं होता है, इस वजह से आजकल युवा मे ये रोग जादा तर दिखाई देने लगा है l

घुटनो मे, कंधो मे, कुल्हो मे, यह ज्यादातर दिखाई देता है l

लक्षण –
सभी जोडो मे तीव्र दर्द दिखाई देता है l
कभी कभी इसके साथ सुजन, त्वचा लाल होना यह लक्षण दिखाई देते है l
शरीर के हालचाल के दरम्यान यह बढ जाता है l
घुटनो मे तीव्र दर्द, एडियो मे, कंधो में और कभी कभी कुल्हो मे जादा तर दिखाई देता है l
स्थिधातू का पोषण कम होने के कारण अस्थी धातू की झीज हो जाती है l
इस वजह से इसकी निर्मिती हो जाती है l

आमवात../ Rheumatoid Arthritis

आमवात और Rheumatoid Arthritis इन दो रोगोके लक्षण समान होते है l आमवात एक बहुत दर्दनाक वात रोग है l
गलत खान पान और आहार विहार के कारण शरीर मे पाचन क्षमता मे बिघाड हो जाता है l 

अपक्व आहार रस की निर्मिती होती है l उससे बाद मे “आम ” निर्माण होता है l यह आम वात दोष के गती को अवरोध निर्माण करता है l बाद में वात दोष भी प्रकुपीत होता है, इस तरह आमवात की निर्मिती होती है l

शरीर मे सभी जोडो मे सूजन एवं तेज दर्द निर्माण होता है l Modern Science के अनुसार इसे Auto Immune Disease कहा जाता है, असाध्य समझा जाता है l लेकीन आयुर्वेद के अनुसार इसे साध्य एवम कष्ट साध्य समझा जाता है l

सही समय पर आयुर्वेद उपचार करने पर यह पूरा ठीक होता है l आमवात सभी उम्र के लोगो को होता है l इसे ज्यादा तर शरीर के बडे संधीयो मे देखा जाता है l पुराना होने पर सभी संधीयो मे फैल जाता है l बाद मे उस संधियो मे अखडन निर्माण करता है l

लक्षण:-

संपूर्ण शरीर एवं जोडो मे बहुत दर्द, सुजन और बुखार निर्माण होता है l घुटनो मे एडियो मे, कंधो मे, कलाई मे, दर्द, सूजन निर्माण करता है l

जोडो मे सूजन, गरम स्पर्श, त्वचा लाल होना, तेज दर्द, अखडन निर्माण होती है l

पुराना होने पर शरीर के सभी संधीयोमे फैल जाता है l इस सभी लक्षण के साथ अरुची, अपचन, आलस्य, आम्लपित्त, मलावष्टंभ हे लक्षण निर्माण होते है l

Spondylosis

रिढ के हड्डी, मेरुदंड के रोग किसी भी आयु मे होते है l शारीरिक पोषण न होने के कारण मांसधातू, अस्थी धातू पोषण कम हो जाता है l 

व्यायाम के अभाव से शरीर के स्नायू कमजोर हो जाते है lस्नायू कठीण बन जाते है l इससे मेरुदंड पर जादा दबाव पडने से डिस्क पर दबाव आता है, उससे मज्जारज्जू से निकलने वाले मज्जातंतू पर जादा दबाव बढ जाता हैl

ये सभी मज्जा तंतू गर्दन,कंधे से कमर के रिढ की हड्डी से हाथ और पैरो मे जाते है l इससे दोनो तरफ के स्नायू को बल मिलता है l

पोषण कम होने से डिस्क खराब,कमकुवत होती है lउससे भी शरीर मे दर्द होता है lजादा तर युवाओ मे होने वाले इस रोग मे गलत खानपान ,व्यायाम का अभाव और कम पोषण मूल्य का आहार समाविष्ट है l

वयस्को में उनके वय के हिसाब से धातू पोषण कम हो जाता है उससे यह रोग दिखाई देते है l कई बार अपने शारीरिक क्षमता से ज्यादा वजन उठाना ,काम करना और कही बार एक्सीडेंट से ये रोग होते है l

Cervical spondylosis :-
कंधे मे दर्द
गर्दन अखडना
एक या दोनो हाथ मे दर्द होना, हाथ सुन्न होना
उंगलीयो मे दर्द होना
सिर दर्द होना
पीठ मे दर्द होना

Lumber spondylosis :-
कमर में दर्द
कमर अखडना
आगे पीछे झुकते समय दर्द होना
कूल्हो में (Hip Joint) में दर्द होना
एक या दोनो पैरो में दर्द होना
एक या दोनो पैर सुन्न होना

Ankylosing Spondylosis

 वांतरोगो मे युवको मे जादा तर होने वाला ये रोग है l आमवात और Ankylosing Spondylosis के लक्षण ज्यादातर समान रहते है l

 शरीर के spine ( मेरुदंड) में तेजदर्द करनेवाला रोग है l गलत खान पान की वजह से शरीर के पाचन तंत्र मे बिघाड हो जाता है l

अपक्व आहार रस निर्माण होने के बाद में आगे उससे आम बनता है l यही आम अगर मेरुदंड में जाये तो वहा यह रोग तयार हो जाता है l

यह भी एक Auto Immune Disease है जिसे modern science में असाध्य समझा जाता हैl लेकीन सही समय पर शुद्ध आयुर्वेद करने के बाद यह रोग आयुर्वेद के दृष्टी से साध्य है l

प्रथम अवस्था मे रीढ की हड्डी मे और बाद मे पुरे मेरूदंड मे फैल जाता हैlपुराना होने पर सभी मेरुदंड एक – एक करके चिपक जाते है l इससे आदमी बिलकुल हील नही सकता lबांबू की तरह हो जाता है, इसलिये इसे बांबू स्पाइन कहा जाता है l

लक्षण:-
       इस रोग की शूरू में रिढ की हड्डी मे दर्द होता है l बाद में यह बहुत बढ जाता है, जिसकी वजह से शरीर हिलाना मुश्किल हो जाता है l

       बाद में यह दर्द पूरे मेरुदंड(spine) मे फैलता हैl इस वजह से उठना – बैठना, सोना इस तरह के कोई भी काम करना मुश्किल होता है l

       शरीर हमेशा बुखार होने की तरह गरम रहता है l रोग जैसे जैसे पुराना होता है तो पुरे मेरूदंड मे अखडण पैदा होती है l जिसकी वजह से आगे पीछे झुकना, गर्दन हिलाना, सीधे सोना सभी बंद हो जाता है lआदमी बांबू की तरह सरल हो जाता है l

       कुल्हो की संधी मे दर्द ,मन्यास्तंभ (गर्दन अखडना) घुटनो मे दर्द ऐसे लक्षण आमवात जैसे तयार होते है l
इसके साथ – साथ पाचन तंत्र के आम्लपित्त, अरुची जैसे लक्षण तो हमेशा होते हैl

वातरक्त

शरीर मे वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने पर इस व्याधी की निर्मिती होती है l शरीर के छोटे छोटे जोडो मे ये दिखाई देता है l
शरीर के हाथ और पैरो के उंगली के संधियो मे जादा तर दिखाई देता हैl संधी प्रदेश मे तीव्र पीडा होती है l

लवण, आम्ल, कटू, अतिस्निग्ध, क्षार, अतिउष्ण पदार्थ सेवन करना, मिथ्या आहार विहार, विरुद्धआहार सेवन अति मांसाहार इस कारनों से वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने के बाद वातरक्त का निर्माण होता है l 

ज्यादा तर अंगुष्ठमूलसे इसकी शुरुवात होती है l Modern Science मे Gout disease इसका लक्षण साधर्म्या रोग समझा जाता है l

सही समय और योग्य आयुर्वेद उपचार से वातरक्त पुरी तरह से ठीक होता है l

लक्षण:-
      संधीप्रदेश में तीव्र वेदना, संधिप्रदेश आरक्त वर्ण हो जाता है l

      जोडो मे शोथ ( सुजन) रहती है l स्पर्श गरम रहने से तीव्र वेदना के कारण हलका आघात भी नही सहन होता l

      ये रोग पुराना होने के बाद शरीर के सभी जोडो में फेल जाता है l शरीर को पुरी तरह पंगु बनाता है l

      रोग पुराना होने के बाद छोटे – छोटे जोडो मेंअखडन पैदा करता है l

Online Treatments
  • आम्लपित्त (Hyperacidity)
  • परिणाम शूल (Duodenal Ulcer)
  • अरुची (Anorexia)
  • अग्निमांद्य
  • अतिसार (Diarrhea)
  • प्रवाहिका (Dysentery)
  • संग्रहणी (Colitis)
  • अर्श.. मूळव्याध (Piles)
  • फिशर
  • कब्ज (Constipation)
  • कामला (Hepatitis)
  • कास ( Bronchitis)
  • श्वास.. (Asthama)
  • मूत्राश्मरी (Urinary Calculus)
  • मुत्रदाह (Urine tract Inf.)
  • शिरशूल (Migraine)
  • Hairloss
  • पिंपल्स (Acne)
  • PCOD
  • रजोरोध (Amenorrhea)
  • रक्तप्रदर (Menorrhagia)
  • श्वेतप्रदर
  • वंध्यत्व (Infertility in Female)
  • वंध्यत्व (Infertility in Male)
  • शीघ्रपतन (Premature Ejaculation)
  • वाजीकरण एवं रसायन चिकित्सा
  • प्रतिश्याय (Allergy सर्दी)
  • Weight Loss
पंचतत्व (Panchkarma At Home)
"संपूर्ण " शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा

नाम से ही इस आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा का उद्देश आपके समझ मे आता है l रुग्ण के प्रकृती का परीक्षण करने के बाद संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा का प्लॅन तयार किया जाता है l इस चिकित्सा से शरीर का अंतर्गत शरीर शुद्धीकरण किया जाता है l

संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा से शरीर का बढा हुआ वजन कम होना शुरू होता है और जिंनका कम है उनका बढना शुरू होता हैl पंचज्ञानेंद्रिय ,पंचकर्मेंद्रिय और पाचकाग्नी आरोग्य बढता है l
 
संपूर्ण शरीर का आरोग्य पाचन व्यवस्थापर निर्भर है l पाचनव्यवस्था का आरोग्य पाचकाग्नी पर निर्भर हैl इस पंचकर्म चिकित्सा से शरीरांतर्गत सभी विषद्रव्ये शरीर के बाहर निकाल दिये जाते है l
 
यही विषद्रव्य शरीर मे रहकर बहुत सारे रोग निर्माण करते है l विषद्रव्य शरीर से बाहर निकलने के बाद किसी भी रोग की जड ही शरीर से बाहर निकाल दीं जाती हैl शरीर मे नये रोगो के निर्मिती को प्रतिबंध किया जाता है l
 
यह पंचकर्म चिकित्सा
सप्तधातुवर्धन कांतीवर्धन होती है l शरीर की चुस्तीफुर्ती बढती हैl किसी भी आयुका व्यक्ती यह चिकित्सा ले सकता है l
 
इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
आरोग्यवर्धिनी चिकित्सा

हमारी इस हर रोज की भागदौड की जिंदगी मे हम अपने आपको पूरी तरह फिट रखना चाहते है l आरोग्य ठीक रखने के लिए प्राणायाम योगासन व्यायाम या जिम जाते है l बहुत दिन तक ये सब कुछ करने से भी हमे आरोग्य नही मिलता l बहुत बार बडा हुआ वजन कम करने के लिए ही व्यायाम करते है l

इस प्रकार से वजन कम होने के बाद भी हमे आरोग्य नही मिलता, हम तंदुरुस्त नही बन जातेl इसका एकही कारण होता है, ये सब कुछ करने से पहले हम ये नही देखते हमारा शरीर इसके लिए ठीक है या नही l
 
प्राणायाम योगासन शुरू करने से पहले हमे अपना शरीर अंदर से ठीक करना चाहिएl जब हम हमारा शरीर अंदर से ठीक करेंगे तो प्राणायाम आदि का उपयोग हमे पुरी तरह से होगा l
 
हमारे शरीर का वजन जब हर रोज बढने लगता है, तो हमे ये समजना चाहिये की हमारी शरीर के अंदर के प्रक्रिया मे कुछ गडबड चल रही है l जिससे हम जो भी खा रहे है उसका पूरी तरह से पचन नही हो रहा है l बल्की उसका रूपांतर मेंद मे (Fat) हो रहा है l
 
शरीर के अंदर की बिगडी हुई इस प्रक्रिया को हम पहले ठीक करे तो हमे प्राणायाम आदि का उपयोग पुरी तरह से होगाl बिना सिस्टीम को ठीक किये हुये अगर हम व्यायाम करते है तो उसका फायदा हमे नही मिलता है l
 
सिर्फ वजन बढना इतना ही सीमित इसका अर्थ नही है बल्की हर रोज भी अन्न हम खा रहे है , उसका पाचन पुरी तरह से होकर उसका रूपांतर सप्तधातू मे अच्छी तरह से हो जाये l
 
इस सब उद्देश्य को समझ कर च्यवन आयुर्वेद ने “आरोग्यवर्धिनी चिकित्सा” नामक एक पंचकर्म चिकित्सा तयार की हैl इससे हमारा शरीर अंदर से शुद्ध होकर शरीर की पूरी सिस्टीम अच्छी तरह से चले l इस चिकित्सा से शरीर का पाचन तंत्र पूरी तरह से ठीक होकर खाये हुये अन्न का सप्तधातूमे रूपांतर करता हैl इससे हमारा शरीर तंदुरुस्त सुदृढ होने मे मदद मिलती हैl
 
आरोग्यवर्धिनी चिकित्सा लेने के लिए आप बीमार होने की जरूरत नही है, अगर आप निरोगी हो तो भी आप अपने शरीर को तंदूरुस्त रखने के लिए इसका उपयोग कर सकते है l
इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
अविपत्तिकर चिकित्सा
आम्लपित्त एक ऐसा व्याधी है जिससे व्यक्ती वर्षानुवर्ष हैरान रहता है l आहार पचन न होने की वजह से पित्त प्रकुपित होना, उल्टी होना, सिर मे दर्द, चक्कर आना, पेट मे दर्द, अन्न पचन न होना ऐसी बहुत सारी लक्षणे दिखाई देती हैं l
च्यवन आयुर्वेद ने “अविपत्तीकर चिकित्सा” नाम की एक पंचकर्म चिकित्सा आम्लपित्त व्याधी के रोगियों के लिये तयार की है l
 
इस प्रकार के चिकित्सा मे आम्लपित्त व्याधी के मूल कारण को ढूढकर उस पर उपचार किया जाता है l आम्लपित्त व्याधी के कारण को शरीर से पुरी तरह निकाल दिया जाता है l
 
इस प्रकार के पंचकर्म चिकित्सा से आपके आम्लपित्त व्याधी का मूल कारण शरीर से पूरी तरह बाहर निकाल दिया जाता हैl इसके साथ आप आगे अगर आयुर्वेदिय औषधी लेते है और परहेज पर रहते है तो आपका ये व्याधी पुरी तरह से ठीक होता है l
 
इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करेl
पचनामृत चिकित्सा
इस चिकित्सा के नाम से ही आप समझ सकते है कि ये चिकित्सा शरीर मे क्या काम करती है l
हमारे शरीर का पाचन तंत्र अगर ठीक रहता है ,तोही हमारा शरीर तंदुरुस्त और आरोग्यपूर्ण रहेगा l 
पाचन तंत्र मे बिगाड होने से भूक न लगना , खाने के बाद उलटी होना, पेट मे गॅस होना ,दर्द होना, पुरी तरसे अन्नपचन न होना, पेट हमेशा भरा रहना,पचन न होने कीवजहसे मलावश्टंभ(constipation) होना ऐसे बहुत सारे लक्षण हमे दिखाई देते है l
 
च्यवन आयुर्वेदने पाचन तंत्र के लिए अमृत जैसे काम करने वाली पचनामृत चिकित्सा नामक एक पंचकर्म चिकित्सा तयार की है l ये आपके पाचन तंत्र के लिये अमृत जैसा काम करती है और बिगडे हुए पाचन तंत्र को पूरी तरह से तंदुरुस्त करती है l
 
इस पंचकर्म चिकित्सा के बाद थोडे दिन आप अगर आयुर्वेद औषधी या लेते हो तो आपका पाचन तंत्र हमेशा के लिए ठीक हो जाता है l यह पंचकर्म चिकित्सा आपके प्रकृती के अनुसार तयार की जाती है जिससे आपको पंचकर्म का पूरी तरह से लाभ होता है l
 
इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
चंद्रकांती चिकित्सा/ Panchkarma for Bride
शरीर की उपरी सौंदर्य के लिए हम विवाह के समय हजारो रुपये खर्च करते है लेकिन शरीर के अंतर्गत सौंदर्य का हम खयाल नही रखते l
 शरीर का उपरी सौंदर्य तभी निखरता है जब शरीर अंदर से तंदुरुस्त हो l अगर शरीर अंदर से निरोगी तंदुरुस्त हो तो उसका असर शरीर के ऊपरित्वचा पर अपने आप आ जाता है l
इन सभी चीज हो का ध्यान रखते हुए इस प्रकार की आयुर्वेद चिकित्सा खास नववधूं के लिए तयार कि गयी है l
 
नववधू जिनका विवाह होनेवाला है और जिंनका विवाह अभी हुआ है इन दोनो के लिये चिकित्सा है l नववधू के प्रकृती परीक्षण और सप्तधातू परीक्षण करने के बाद पंचकर्म चिकित्सा का प्लॅन तयार किया जाता है l
 
शरीर का सौंदर्य और आरोग्य बढाने वाली यह चिकित्सा आपको सुंदर और तंदुरुस्त बनाती है l शरीर की कांती और त्वचा का आरोग्य सुधारने के साथ साथ आपकी पाचन भी बढाती हैl
 
शरीर का आरोग्य ठीक रहना पचन व्यवस्था पर निर्भर रहता है l
चंद्रकांती चिकित्सा आपको एक सुंदर नववधू बनाने के साथ तंदुरुस्त भी बनायेगी l भविष्य मे प्रजनन के लिये आयुर्वेद से आपका शरीर निरोगी और तंदुरुस्त बनाये l
 
इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
मकरध्वज चिकित्सा/Panchakarma for Groom
पुरुष को मजबूत और तंदुरुस्त तभी समझा जाता है जब उसके शरीर के सप्त धातू पुष्ट, मजबूत, तंदुरुस्त हो l 
विवाहेच्छुक पुरुष या जिंनका विवाह तय हुआ है या जिंनका विवाह अभी हुआ है, ये सभी पुरुष इस चिकित्सा का लाभ ले सकते है l
रस ,रक्त ,मांस ,मेद ,अस्थी, मज्जा ,शुक्र इन सप्त धातू को निरोगी और धातू पुष्टता करने वाली चिकित्सा मकरध्वज चिकित्सा है l
 
पुरुष के प्रकृती और सप्तधातू का परीक्षण करने के बाद पंचकर्म चिकित्सा तयार की जाती है l इस पंचकर्म चिकित्सा से शरीर का अंतर्गत शुद्धीकरण करने के बाद धातुवर्धन चिकित्सा की जाती है l
 
मकरध्वज चिकित्सा आपको अंतर्बाह्य तंदुरुस्त और पुष्ट बनाती हैl इससे आपका हर दिन आनंदी बन जाता है l
अगर जरूरत पडे तो पंचकर्म चिकित्सा के बाद आयुर्वेद औषधिया लेने की सलाह दी जाती है l
 
इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करेl

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    संधिगत वात/ Osteo - Arthritis

    वात रोग मे सर्वाधिक होने वाला संधिगतवात हैं l
    वृद्धावस्था मे यह जादा तर दिखाई देता है |

    आमवात, वातरक्त जैसे वात रोग अगर ज्यादा दिन तक शरीर मे रहे तो बाद में उनके साथ संधिगतवात भी हो जाता है l

    शरीर के सप्तधातू मे क्षय होने के बाद संधिगत वात की निर्मिती होती है l ज्यादा दिंन तक संधीगत वात शरीर मे रहने से शरीर के जोडाे मे दर्द बढने से उनका नाश होता हैंl उन जोडो की क्रिया हानी हो जाती हैl

    ज्यादा तर वृद्धावस्था मे दिखाई देने वाला यह व्याधी आमवात, वातरक्त व्याधी के कारण युवा मे भी जादा दिखाई देने लगा है l

    फास्ट फूड, जंक फूड, हॉटेल के आहार का सेवन इन आदतो के कारण शरीर धातू का पोषण नहीं होता है, इस वजह से आजकल युवा मे ये रोग जादा तर दिखाई देने लगा है l

    घुटनो मे, कंधो मे, कुल्हो मे, यह ज्यादातर दिखाई देता है l

    लक्षण –
    सभी जोडो मे तीव्र दर्द दिखाई देता है l
    कभी कभी इसके साथ सुजन, त्वचा लाल होना यह लक्षण दिखाई देते है l
    शरीर के हालचाल के दरम्यान यह बढ जाता है l
    घुटनो मे तीव्र दर्द, एडियो मे, कंधो में और कभी कभी कुल्हो मे जादा तर दिखाई देता है l
    स्थिधातू का पोषण कम होने के कारण अस्थी धातू की झीज हो जाती है l
    इस वजह से इसकी निर्मिती हो जाती है l

    आमवात../ Rheumatoid Arthritis

    आमवात और Rheumatoid Arthritis इन दो रोगोके लक्षण समान होते है l आमवात एक बहुत दर्दनाक वात रोग है l
    गलत खान पान और आहार विहार के कारण शरीर मे पाचन क्षमता मे बिघाड हो जाता है l 

    अपक्व आहार रस की निर्मिती होती है l उससे बाद मे “आम ” निर्माण होता है l यह आम वात दोष के गती को अवरोध निर्माण करता है l बाद में वात दोष भी प्रकुपीत होता है, इस तरह आमवात की निर्मिती होती है l

    शरीर मे सभी जोडो मे सूजन एवं तेज दर्द निर्माण होता है l Modern Science के अनुसार इसे Auto Immune Disease कहा जाता है, असाध्य समझा जाता है l लेकीन आयुर्वेद के अनुसार इसे साध्य एवम कष्ट साध्य समझा जाता है l

    सही समय पर आयुर्वेद उपचार करने पर यह पूरा ठीक होता है l आमवात सभी उम्र के लोगो को होता है l इसे ज्यादा तर शरीर के बडे संधीयो मे देखा जाता है l पुराना होने पर सभी संधीयो मे फैल जाता है l बाद मे उस संधियो मे अखडन निर्माण करता है l

    लक्षण:-

    संपूर्ण शरीर एवं जोडो मे बहुत दर्द, सुजन और बुखार निर्माण होता है l घुटनो मे एडियो मे, कंधो मे, कलाई मे, दर्द, सूजन निर्माण करता है l

    जोडो मे सूजन, गरम स्पर्श, त्वचा लाल होना, तेज दर्द, अखडन निर्माण होती है l

    पुराना होने पर शरीर के सभी संधीयोमे फैल जाता है l इस सभी लक्षण के साथ अरुची, अपचन, आलस्य, आम्लपित्त, मलावष्टंभ हे लक्षण निर्माण होते है l

    Spondylosis

    रिढ के हड्डी, मेरुदंड के रोग किसी भी आयु मे होते है l शारीरिक पोषण न होने के कारण मांसधातू, अस्थी धातू पोषण कम हो जाता है l 

    व्यायाम के अभाव से शरीर के स्नायू कमजोर हो जाते है lस्नायू कठीण बन जाते है l इससे मेरुदंड पर जादा दबाव पडने से डिस्क पर दबाव आता है, उससे मज्जारज्जू से निकलने वाले मज्जातंतू पर जादा दबाव बढ जाता हैl

    ये सभी मज्जा तंतू गर्दन,कंधे से कमर के रिढ की हड्डी से हाथ और पैरो मे जाते है l इससे दोनो तरफ के स्नायू को बल मिलता है l

    पोषण कम होने से डिस्क खराब,कमकुवत होती है lउससे भी शरीर मे दर्द होता है lजादा तर युवाओ मे होने वाले इस रोग मे गलत खानपान ,व्यायाम का अभाव और कम पोषण मूल्य का आहार समाविष्ट है l

    वयस्को में उनके वय के हिसाब से धातू पोषण कम हो जाता है उससे यह रोग दिखाई देते है l कई बार अपने शारीरिक क्षमता से ज्यादा वजन उठाना ,काम करना और कही बार एक्सीडेंट से ये रोग होते है l

    Cervical spondylosis :-
    कंधे मे दर्द
    गर्दन अखडना
    एक या दोनो हाथ मे दर्द होना, हाथ सुन्न होना
    उंगलीयो मे दर्द होना
    सिर दर्द होना
    पीठ मे दर्द होना

    Lumber spondylosis :-
    कमर में दर्द
    कमर अखडना
    आगे पीछे झुकते समय दर्द होना
    कूल्हो में (Hip Joint) में दर्द होना
    एक या दोनो पैरो में दर्द होना
    एक या दोनो पैर सुन्न होना

    Ankylosing Spondylosis

     वांतरोगो मे युवको मे जादा तर होने वाला ये रोग है l आमवात और Ankylosing Spondylosis के लक्षण ज्यादातर समान रहते है l

     शरीर के spine ( मेरुदंड) में तेजदर्द करनेवाला रोग है l गलत खान पान की वजह से शरीर के पाचन तंत्र मे बिघाड हो जाता है l

    अपक्व आहार रस निर्माण होने के बाद में आगे उससे आम बनता है l यही आम अगर मेरुदंड में जाये तो वहा यह रोग तयार हो जाता है l

    यह भी एक Auto Immune Disease है जिसे modern science में असाध्य समझा जाता हैl लेकीन सही समय पर शुद्ध आयुर्वेद करने के बाद यह रोग आयुर्वेद के दृष्टी से साध्य है l

    प्रथम अवस्था मे रीढ की हड्डी मे और बाद मे पुरे मेरूदंड मे फैल जाता हैlपुराना होने पर सभी मेरुदंड एक – एक करके चिपक जाते है l इससे आदमी बिलकुल हील नही सकता lबांबू की तरह हो जाता है, इसलिये इसे बांबू स्पाइन कहा जाता है l

    लक्षण:-
           इस रोग की शूरू में रिढ की हड्डी मे दर्द होता है l बाद में यह बहुत बढ जाता है, जिसकी वजह से शरीर हिलाना मुश्किल हो जाता है l

           बाद में यह दर्द पूरे मेरुदंड(spine) मे फैलता हैl इस वजह से उठना – बैठना, सोना इस तरह के कोई भी काम करना मुश्किल होता है l

           शरीर हमेशा बुखार होने की तरह गरम रहता है l रोग जैसे जैसे पुराना होता है तो पुरे मेरूदंड मे अखडण पैदा होती है l जिसकी वजह से आगे पीछे झुकना, गर्दन हिलाना, सीधे सोना सभी बंद हो जाता है lआदमी बांबू की तरह सरल हो जाता है l

           कुल्हो की संधी मे दर्द ,मन्यास्तंभ (गर्दन अखडना) घुटनो मे दर्द ऐसे लक्षण आमवात जैसे तयार होते है l
    इसके साथ – साथ पाचन तंत्र के आम्लपित्त, अरुची जैसे लक्षण तो हमेशा होते हैl

    वातरक्त (Gout)

    शरीर मे वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने पर इस व्याधी की निर्मिती होती है l शरीर के छोटे छोटे जोडो मे ये दिखाई देता है l
    शरीर के हाथ और पैरो के उंगली के संधियो मे जादा तर दिखाई देता हैl संधी प्रदेश मे तीव्र पीडा होती है l

    लवण, आम्ल, कटू, अतिस्निग्ध, क्षार, अतिउष्ण पदार्थ सेवन करना, मिथ्या आहार विहार, विरुद्धआहार सेवन अति मांसाहार इस कारनों से वातदोष और रक्तदोष निर्माण होने के बाद वातरक्त का निर्माण होता है l 

    ज्यादा तर अंगुष्ठमूलसे इसकी शुरुवात होती है l Modern Science मे Gout disease इसका लक्षण साधर्म्या रोग समझा जाता है l

    सही समय और योग्य आयुर्वेद उपचार से वातरक्त पुरी तरह से ठीक होता है l

    लक्षण:-
          संधीप्रदेश में तीव्र वेदना, संधिप्रदेश आरक्त वर्ण हो जाता है l

          जोडो मे शोथ ( सुजन) रहती है l स्पर्श गरम रहने से तीव्र वेदना के कारण हलका आघात भी नही सहन होता l

          ये रोग पुराना होने के बाद शरीर के सभी जोडो में फेल जाता है l शरीर को पुरी तरह पंगु बनाता है l

          रोग पुराना होने के बाद छोटे – छोटे जोडो मेंअखडन पैदा करता है l

    Panchatatva
    "संपूर्ण " शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा

    नाम से ही इस आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा का उद्देश आपके समझ मे आता है l रुग्ण के प्रकृती का परीक्षण करने के बाद संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा का प्लॅन तयार किया जाता है l इस चिकित्सा से शरीर का अंतर्गत शरीर शुद्धीकरण किया जाता है l

    संपूर्ण शरीर शुद्धीकरण चिकित्सा से शरीर का बढा हुआ वजन कम होना शुरू होता है और जिंनका कम है उनका बढना शुरू होता हैl पंचज्ञानेंद्रिय ,पंचकर्मेंद्रिय और पाचकाग्नी आरोग्य बढता है l
     
    संपूर्ण शरीर का आरोग्य पाचन व्यवस्थापर निर्भर है l पाचनव्यवस्था का आरोग्य पाचकाग्नी पर निर्भर हैl इस पंचकर्म चिकित्सा से शरीरांतर्गत सभी विषद्रव्ये शरीर के बाहर निकाल दिये जाते है l
     
    यही विषद्रव्य शरीर मे रहकर बहुत सारे रोग निर्माण करते है l विषद्रव्य शरीर से बाहर निकलने के बाद किसी भी रोग की जड ही शरीर से बाहर निकाल दीं जाती हैl शरीर मे नये रोगो के निर्मिती को प्रतिबंध किया जाता है l
     
    यह पंचकर्म चिकित्सा
    सप्तधातुवर्धन कांतीवर्धन होती है l शरीर की चुस्तीफुर्ती बढती हैl किसी भी आयुका व्यक्ती यह चिकित्सा ले सकता है l
     
    इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
    आरोग्यवर्धिनी चिकित्सा

    हमारी इस हर रोज की भागदौड की जिंदगी मे हम अपने आपको पूरी तरह फिट रखना चाहते है l आरोग्य ठीक रखने के लिए प्राणायाम योगासन व्यायाम या जिम जाते है l बहुत दिन तक ये सब कुछ करने से भी हमे आरोग्य नही मिलता l बहुत बार बडा हुआ वजन कम करने के लिए ही व्यायाम करते है l

    इस प्रकार से वजन कम होने के बाद भी हमे आरोग्य नही मिलता, हम तंदुरुस्त नही बन जातेl इसका एकही कारण होता है, ये सब कुछ करने से पहले हम ये नही देखते हमारा शरीर इसके लिए ठीक है या नही l
     
    प्राणायाम योगासन शुरू करने से पहले हमे अपना शरीर अंदर से ठीक करना चाहिएl जब हम हमारा शरीर अंदर से ठीक करेंगे तो प्राणायाम आदि का उपयोग हमे पुरी तरह से होगा l
     
    हमारे शरीर का वजन जब हर रोज बढने लगता है, तो हमे ये समजना चाहिये की हमारी शरीर के अंदर के प्रक्रिया मे कुछ गडबड चल रही है l जिससे हम जो भी खा रहे है उसका पूरी तरह से पचन नही हो रहा है l बल्की उसका रूपांतर मेंद मे (Fat) हो रहा है l
     
    शरीर के अंदर की बिगडी हुई इस प्रक्रिया को हम पहले ठीक करे तो हमे प्राणायाम आदि का उपयोग पुरी तरह से होगाl बिना सिस्टीम को ठीक किये हुये अगर हम व्यायाम करते है तो उसका फायदा हमे नही मिलता है l
     
    सिर्फ वजन बढना इतना ही सीमित इसका अर्थ नही है बल्की हर रोज भी अन्न हम खा रहे है , उसका पाचन पुरी तरह से होकर उसका रूपांतर सप्तधातू मे अच्छी तरह से हो जाये l
     
    इस सब उद्देश्य को समझ कर च्यवन आयुर्वेद ने “आरोग्यवर्धिनी चिकित्सा” नामक एक पंचकर्म चिकित्सा तयार की हैl इससे हमारा शरीर अंदर से शुद्ध होकर शरीर की पूरी सिस्टीम अच्छी तरह से चले l इस चिकित्सा से शरीर का पाचन तंत्र पूरी तरह से ठीक होकर खाये हुये अन्न का सप्तधातूमे रूपांतर करता हैl इससे हमारा शरीर तंदुरुस्त सुदृढ होने मे मदद मिलती हैl
     
    आरोग्यवर्धिनी चिकित्सा लेने के लिए आप बीमार होने की जरूरत नही है, अगर आप निरोगी हो तो भी आप अपने शरीर को तंदूरुस्त रखने के लिए इसका उपयोग कर सकते है l
    इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
    अविपत्तिकर चिकित्सा
    आम्लपित्त एक ऐसा व्याधी है जिससे व्यक्ती वर्षानुवर्ष हैरान रहता है l आहार पचन न होने की वजह से पित्त प्रकुपित होना, उल्टी होना, सिर मे दर्द, चक्कर आना, पेट मे दर्द, अन्न पचन न होना ऐसी बहुत सारी लक्षणे दिखाई देती हैं l
    च्यवन आयुर्वेद ने “अविपत्तीकर चिकित्सा” नाम की एक पंचकर्म चिकित्सा आम्लपित्त व्याधी के रोगियों के लिये तयार की है l
     
    इस प्रकार के चिकित्सा मे आम्लपित्त व्याधी के मूल कारण को ढूढकर उस पर उपचार किया जाता है l आम्लपित्त व्याधी के कारण को शरीर से पुरी तरह निकाल दिया जाता है l
     
    इस प्रकार के पंचकर्म चिकित्सा से आपके आम्लपित्त व्याधी का मूल कारण शरीर से पूरी तरह बाहर निकाल दिया जाता हैl इसके साथ आप आगे अगर आयुर्वेदिय औषधी लेते है और परहेज पर रहते है तो आपका ये व्याधी पुरी तरह से ठीक होता है l
     
    इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करेl
    पचनामृत चिकित्सा
    इस चिकित्सा के नाम से ही आप समझ सकते है कि ये चिकित्सा शरीर मे क्या काम करती है l
    हमारे शरीर का पाचन तंत्र अगर ठीक रहता है ,तोही हमारा शरीर तंदुरुस्त और आरोग्यपूर्ण रहेगा l 
    पाचन तंत्र मे बिगाड होने से भूक न लगना , खाने के बाद उलटी होना, पेट मे गॅस होना ,दर्द होना, पुरी तरसे अन्नपचन न होना, पेट हमेशा भरा रहना,पचन न होने कीवजहसे मलावश्टंभ(constipation) होना ऐसे बहुत सारे लक्षण हमे दिखाई देते है l
     
    च्यवन आयुर्वेदने पाचन तंत्र के लिए अमृत जैसे काम करने वाली पचनामृत चिकित्सा नामक एक पंचकर्म चिकित्सा तयार की है l ये आपके पाचन तंत्र के लिये अमृत जैसा काम करती है और बिगडे हुए पाचन तंत्र को पूरी तरह से तंदुरुस्त करती है l
     
    इस पंचकर्म चिकित्सा के बाद थोडे दिन आप अगर आयुर्वेद औषधी या लेते हो तो आपका पाचन तंत्र हमेशा के लिए ठीक हो जाता है l यह पंचकर्म चिकित्सा आपके प्रकृती के अनुसार तयार की जाती है जिससे आपको पंचकर्म का पूरी तरह से लाभ होता है l
     
    इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
    चंद्रकांती चिकित्सा/ Panchkarma for Bride
    शरीर की उपरी सौंदर्य के लिए हम विवाह के समय हजारो रुपये खर्च करते है लेकिन शरीर के अंतर्गत सौंदर्य का हम खयाल नही रखते l
     शरीर का उपरी सौंदर्य तभी निखरता है जब शरीर अंदर से तंदुरुस्त हो l अगर शरीर अंदर से निरोगी तंदुरुस्त हो तो उसका असर शरीर के ऊपरित्वचा पर अपने आप आ जाता है l
    इन सभी चीज हो का ध्यान रखते हुए इस प्रकार की आयुर्वेद चिकित्सा खास नववधूं के लिए तयार कि गयी है l
     
    नववधू जिनका विवाह होनेवाला है और जिंनका विवाह अभी हुआ है इन दोनो के लिये चिकित्सा है l नववधू के प्रकृती परीक्षण और सप्तधातू परीक्षण करने के बाद पंचकर्म चिकित्सा का प्लॅन तयार किया जाता है l
     
    शरीर का सौंदर्य और आरोग्य बढाने वाली यह चिकित्सा आपको सुंदर और तंदुरुस्त बनाती है l शरीर की कांती और त्वचा का आरोग्य सुधारने के साथ साथ आपकी पाचन भी बढाती हैl
     
    शरीर का आरोग्य ठीक रहना पचन व्यवस्था पर निर्भर रहता है l
    चंद्रकांती चिकित्सा आपको एक सुंदर नववधू बनाने के साथ तंदुरुस्त भी बनायेगी l भविष्य मे प्रजनन के लिये आयुर्वेद से आपका शरीर निरोगी और तंदुरुस्त बनाये l
     
    इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करे l
    मकरध्वज चिकित्सा/Panchakarma for Groom
    पुरुष को मजबूत और तंदुरुस्त तभी समझा जाता है जब उसके शरीर के सप्त धातू पुष्ट, मजबूत, तंदुरुस्त हो l 
    विवाहेच्छुक पुरुष या जिंनका विवाह तय हुआ है या जिंनका विवाह अभी हुआ है, ये सभी पुरुष इस चिकित्सा का लाभ ले सकते है l
    रस ,रक्त ,मांस ,मेद ,अस्थी, मज्जा ,शुक्र इन सप्त धातू को निरोगी और धातू पुष्टता करने वाली चिकित्सा मकरध्वज चिकित्सा है l
     
    पुरुष के प्रकृती और सप्तधातू का परीक्षण करने के बाद पंचकर्म चिकित्सा तयार की जाती है l इस पंचकर्म चिकित्सा से शरीर का अंतर्गत शुद्धीकरण करने के बाद धातुवर्धन चिकित्सा की जाती है l
     
    मकरध्वज चिकित्सा आपको अंतर्बाह्य तंदुरुस्त और पुष्ट बनाती हैl इससे आपका हर दिन आनंदी बन जाता है l
    अगर जरूरत पडे तो पंचकर्म चिकित्सा के बाद आयुर्वेद औषधिया लेने की सलाह दी जाती है l
     
    इस चिकित्सा के अधिक जानकारी के लिए हमे संपर्क करेl
    वात रोगों से मुक्ती

    वात रोगों से मुक्ति के लिये आयुर्वेद ही क्यो?
    आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार किसी भी रोगों पर उपचार उसकी जड पर होता है l रोगो के लक्षणो के अनुसार या रोगो के लक्षणो पर आयुर्वेद उपचार नहीं करता l
    शरीर मे स्थित वात, पित्त, कफ इन तीन दोषो मे जब असंतुलन पैदा होता है, स तब शरीर मे रोगो की निर्मिती हो जाती है l कभी कभी वात दोष किसी कारणा नुसार खुद बिगड जाता है और कभी शरीर मे प्रकूपित्त पित्त और कफ दोष वात को बिगाड देते है l इन सभी कारणो से शरीर मे बात रोग हो जाते है l

    शरीर मे वात ,पित्त, कफ प्रकुपित होने पर अलग अलग तरह के वात रोग होते हे l
    1) धातू क्षयजन्य वात रोग
    2 ) अवरोधजन्य वात रोग
    धातू क्षयजन्य वातरोग….
    शरीर मे स्थित सप्तधातू ( रस,रक्त ,मांस मेद, अस्थी, मज्जा, शुक्र) अगर क्षीण होते हैं या उन मे क्षय निर्माण होने से शरीर मे वात दोष बढ जाता है उसके स्वरूप अनुसार विविध प्रकार के धातूक्षय जन्य वात रोग होते है l जिस धातू का क्षय हुआ है उसके स्वरूप अनुसार चिकित्सा करने से धातू क्षय जन्य वात रोग नष्ट होते हैं l
    2 ) अवरोधजन्य वातरोग –
    शरीर मे प्रकृपित पित्त या कफ वात दोष के गति को अवरोध निर्माण करते है उस अवरोध अनुसार शरीर मे स्थित वात दोष बिगड जाता है l उसके स्वरूप अवरोधजन्य वातरोग तयार होते है l
    शरीर मे प्रकुपित पित्त और कफको साम्य अवस्था मे लाकर अवरोध नष्ट किया जाता हे, lउसके स्वरूप अवरोधजन्य वात रोग ठीक हो जाते हैं l
    शरीर मे वातरोग बढने का कारण आहार विहार ठीक न करना इसका मतलब गलत खान पान की वजह से शरीर मे अशुद्ध और अपक्व आहार रस की निर्मिती हो जाती है lउससे शरीर स्थित धातू का पोषण न होना और प्रकुपित दोषसे शरीर स्त्रोतोसो मे अवरोध निर्माण होना इन बातो से शरीर मे वात रोग की निर्मिती हो जाती है l
    आयुर्वेद इन सभी कारनो को पहचान कर उन पर उपचार करता है l

    आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा

    पंचकर्म चिकित्सा एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें पाँच विभिन्न प्रकार के शोधन या शुद्धिकरण के प्रक्रियाएं होती हैं। इन प्रक्रियाओं का उपयोग रोगों के इलाज और स्वास्थ्य सुधार के लिए किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति शिरा संशोधन, वमन, विरेचन, नस्य, बस्ती और रक्तमोक्षण से मिलकर बनी होती है।पंचकर्म को आम तौर पर शरीर की शुद्धि और संतुलन को बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह रोगों का इलाज, शारीरिक संतुलन को बनाए रखने और स्वस्थ जीवनशैली के लिए भी किया जा सकता है।

    आयुर्वेद में शरीर शुध्दीकरण का महत्व बहुत उच्च माना जाता है। इसे रोगों के इलाज के लिए, रोगों की रोकथाम में और स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर शुद्धीकरण के माध्यम से शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर संतुलित और स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है। यह संतुलित आहार, व्यायाम, और विभिन्न प्रकार की शोधन प्रक्रियाओं द्वारा किया जा सकता है।शरीर शुध्दीकरण का समय व्यक्ति के रोग और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति के शारीरिक प्रकृति, रोग की गंभीरता, रोग की अवधि, चिकित्सा योजना, और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित होता है। कुछ प्रकार के पंचकर्म प्रक्रियाएं एक से अधिक दिनों तक चल सकती हैं, जबकि कुछ केवल कुछ दिनों तक हो सकती हैं। इसलिए, शरीर शुध्दीकरण की अवधि व्यक्ति के विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

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      वात रोगों से मुक्ती..

       वात रोगों से मुक्ति के लिये आयुर्वेद ही क्यो?
      आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार किसी भी रोगों पर उपचार उसकी जड पर होता है l रोगो के लक्षणो के अनुसार या रोगो के लक्षणो पर आयुर्वेद उपचार नहीं करता l
      शरीर मे स्थित वात, पित्त, कफ इन तीन दोषो मे जब असंतुलन पैदा होता है, स तब शरीर मे रोगो की निर्मिती हो जाती है l कभी कभी वात दोष किसी कारणा नुसार खुद बिगड जाता है और कभी शरीर मे प्रकूपित्त पित्त और कफ दोष वात को बिगाड देते है l इन सभी कारणो से शरीर मे बात रोग हो जाते है l

      शरीर मे वात ,पित्त, कफ प्रकुपित होने पर अलग अलग तरह के वात रोग होते हे l
      1) धातू क्षयजन्य वात रोग
      2 ) अवरोधजन्य वात रोग
      धातू क्षयजन्य वातरोग….
      शरीर मे स्थित सप्तधातू ( रस,रक्त ,मांस मेद, अस्थी, मज्जा, शुक्र) अगर क्षीण होते हैं या उन मे क्षय निर्माण होने से शरीर मे वात दोष बढ जाता है उसके स्वरूप अनुसार विविध प्रकार के धातूक्षय जन्य वात रोग होते है l जिस धातू का क्षय हुआ है उसके स्वरूप अनुसार चिकित्सा करने से धातू क्षय जन्य वात रोग नष्ट होते हैं l
      2 ) अवरोधजन्य वातरोग –
      शरीर मे प्रकृपित पित्त या कफ वात दोष के गति को अवरोध निर्माण करते है उस अवरोध अनुसार शरीर मे स्थित वात दोष बिगड जाता है l उसके स्वरूप अवरोधजन्य वातरोग तयार होते है l
      शरीर मे प्रकुपित पित्त और कफको साम्य अवस्था मे लाकर अवरोध नष्ट किया जाता हे, lउसके स्वरूप अवरोधजन्य वात रोग ठीक हो जाते हैं l
      शरीर मे वातरोग बढने का कारण आहार विहार ठीक न करना इसका मतलब गलत खान पान की वजह से शरीर मे अशुद्ध और अपक्व आहार रस की निर्मिती हो जाती है lउससे शरीर स्थित धातू का पोषण न होना और प्रकुपित दोषसे शरीर स्त्रोतोसो मे अवरोध निर्माण होना इन बातो से शरीर मे वात रोग की निर्मिती हो जाती है l
      आयुर्वेद इन सभी कारनो को पहचान कर उन पर उपचार करता है l

      आयुर्वेद पंचकर्म चिकित्सा

      पंचकर्म चिकित्सा एक प्राचीन आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति है जिसमें पाँच विभिन्न प्रकार के शोधन या शुद्धिकरण के प्रक्रियाएं होती हैं। इन प्रक्रियाओं का उपयोग रोगों के इलाज और स्वास्थ्य सुधार के लिए किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति शिरा संशोधन, वमन, विरेचन, नस्य, बस्ती और रक्तमोक्षण से मिलकर बनी होती है।पंचकर्म को आम तौर पर शरीर की शुद्धि और संतुलन को बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह रोगों का इलाज, शारीरिक संतुलन को बनाए रखने और स्वस्थ जीवनशैली के लिए भी किया जा सकता है।

      आयुर्वेद में शरीर शुध्दीकरण का महत्व बहुत उच्च माना जाता है। इसे रोगों के इलाज के लिए, रोगों की रोकथाम में और स्वस्थ जीवनशैली को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर शुद्धीकरण के माध्यम से शरीर से विषैले तत्वों को निकालकर संतुलित और स्वस्थ शरीर का निर्माण होता है। यह संतुलित आहार, व्यायाम, और विभिन्न प्रकार की शोधन प्रक्रियाओं द्वारा किया जा सकता है।शरीर शुध्दीकरण का समय व्यक्ति के रोग और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करता है। यह व्यक्ति के शारीरिक प्रकृति, रोग की गंभीरता, रोग की अवधि, चिकित्सा योजना, और विशेषज्ञ की सलाह पर आधारित होता है। कुछ प्रकार के पंचकर्म प्रक्रियाएं एक से अधिक दिनों तक चल सकती हैं, जबकि कुछ केवल कुछ दिनों तक हो सकती हैं। इसलिए, शरीर शुध्दीकरण की अवधि व्यक्ति के विशेष परिस्थितियों पर निर्भर करती है।